समाज विज्ञान

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    इंकलाब जिंदाबाद by: अशोक कुमार पाण्डेय 35.00

    शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के चुनिन्दा लेखों का संकलन अशोक कुमार पाण्डेय की लम्बी भूमिका के साथ।

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    मनुष्य का अवकाश by: कुमार अंबुज 35.00

    जाने माने कवि कुमार अंबुज के लेखों का यह संकलन कामगारों के अधिकारों और हालात का सजीव चित्रण करता है। हर उस पाठक के लिए ज़रूरी जो अपने समय को जानना समझना चाहता है।

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    बीसवीं सदी में डाॅ. अंबेडकर का सवाल by: सुभाष गाताड़े 175.00

    जाने माने लेखक सुभाष गाताड़े की यह किताब हमारे समय में अंबेडकरवाद और उसकी प्रासंगिकता को लेकर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है।

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    बेदाद-ए-इश्क़ रुदाद-ए-शादी (बाग़ी प्रेम विवाहों के दास्तान) by: अशोक कुमार पाण्डेय 175.00 150.00

    रवीश कुमार लिखते हैं –

    बेदादइश्क़ : रूदादशादी किताब नहीं, एक दस्तावेज़ है जिसमें कई लोगों ने अपनी प्रेम कहानियों के बनने से लेकर टूटने तक की तकलीफ़देह दास्तानों को ख़ुद दर्ज किया है। अपने प्रेम को खुद की नज़र से देखना और उसे दुनिया भर के पाठकों के लिए लिखना उतना ही मुश्किल रहा होगा, जितना पहली बार अपनी मां या पिता को बताना कि मुझे यह लड़का अच्छा लगता है या यह लड़की अच्छी लगती है। ज़रूर कुछ लोगों ने सरसरी तौर पर अपनी कहानी लिखी हैं, लेकिन कुछ ने इतनी शिद्दत से कहानी लिखी है कि उससे पढ़ना खुद को कष्ट देने जैसा है। ऐसा कष्ट जिससे हम सब भागना चाहते हैं। उनकी प्रेम कहानी की हर घटना का ज़िक्र भले न हों मगर सबने ईमानदारी से इतना तो बता ही दिया है कि प्रेम के भीतर कितना कुछ घटता रहता है। जो लोग इस वक्त प्रेम में हैं या जो किसी भी वक्त प्रेम में हो सकते हैं उन्हें यह किताब पढ़नी चाहिए।

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    प्राचीन भारत में मातृसत्ता और यौनिकता by: लवली गोस्वामी 125.00

    अपनी तरह की यह अनूठी किताब हिन्दू मिथकों के सहारे प्राचीन भारत में स्त्रियॉं की दशा की, खासतौर पर उनकी यौनिकता को केंद्र में रखकर जाँच करती है। दर्शन की अध्येता लवली गोस्वामी ने तमाम उपलब्ध किताबों के शारे बड़े ही रोचक तरीके से मंदिरों, मूर्तियों और मान्यताओं की गहरी पड़ताल की है।

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    भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में मुसलमान by: आनंद कुमार पाण्डेय 150.00

    भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के अध्येता आनंद कुमार पाण्डेय की यह किताब आंदोलन में न केवल मुसलमानों की भूमिका को तलाशती है बल्कि इस बहाने देश में आज़ादी के पहले और बाद के मुस्लिम समाज के मानस मे आए परिवर्तनों की भी पड़ताल करती है। पुस्तक की भूमिका प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखी है।

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    गोलवलकरवाद: एक अध्ययन by: शम्सुल इस्लाम 175.00

    इस पुस्तक की सबसे बड़ी ख़ूबी है आर एस एस की गीता कही जाने वाली एम एस गोलवलकर की किताब “हम या हमारी परिभाषित राष्ट्रीयता” का अविकल अनुवाद। शमसुल इस्लाम से इस किताब पर एक लम्बी टिप्पणी लिखी है। मूलतः अंग्रेज़ी मे प्रकाशित इस किताब का जाने माने लेखक अशोक कुमार पाण्डेय ने बेहद सजीव अनुवाद किया है।