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    हरिओम राजोरिया

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नागरिक मत

Author हरिओम राजोरिया
Category कविता
ISBN 978-81-929221-4-0
Publication दख़ल प्रकाशन
Publishing Year 2014
Edition प्रथम
Price ₹ 125
Offer Price ₹ 100
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About This Book
Overview

हरिओम राजोरिया की कविताएँ भारतीय जनतंत्र के निचले पायदान पर खड़े उस मनुष्य को सम्बोधित हैं जिसपर रोज़ कड़ी मार पड़ती है जिस पर खुद बोझ है जनतंत्र का. जो सिर्फ एक मत है  जिसे झूठे सपने और बनावटी  पहचान  के आधार पर एकत्र कर गिन भर लिया जाता है. जो अवसर मिलने पर इस तन्त्र में शामिल हो धीरे धीरे इसी का एक हिस्सा  हो जाता है,   जिसे उपभोक्तावाद के  सपनों की आदत डाल दी जाती है  और जो इस सपने में छिपे जाल में फंसकर रह जाता है.

ये कविताएँ इस पस्तहाल समय -समाज  की खोज़ खबर लेती हैं, नैतिक टिप्पणी करती हैं और अपना पक्ष रखती हैं.  हरिओम राजोरिया सरल वाक्यों से कविता लिखते हैं और अधिकतर अभिधा में कहते हैं. कविताओं की भंगिमा सम्बोधनपरक है और यही इन कविताओं की संप्रेषणीयता का राज भी है.

Meet the Author
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1964
हरिओम राजोरिया नब्बे के दशक के एक बेहद महत्वपूर्ण कवि हैं. "नागरिक मत" के अलावा उनकी एक कविता पुस्तिका "यह एक सच है (1993)' और दो कविता संकलन "हंसीघर ( 1998)" और "खाली कोना (2007)" प्रकाशित हुए हैं.  हिन्दी कविता परिदृश्य में जिस 'लोक' की बात अक्सर होती हैहरिओम की कविताएँ उसका अतिक्रमण भी करती हैं और उसका एक ऐसा अदेखा दृश्य भी प्रस्तुत करती हैं जो लोक के नाम पर निर्मित एक खास तरह की छवि को ध्वस्त करता है. उनके यहाँ कस्बाई तथा ग्रामीण संस्कृति अपने पूरे रंग में सामने आती है. यह कोई मोनोलिथ 'लोक' नहीं है. इसके कई संस्तर हैं...बेहद संश्लिष्ट और बहुरंगी ...जिनके रस्ते चलकर वह हर बार उस मनुष्य तक की मुश्किल यात्रा करते हैं जो उनकी कविता की सबसे बड़ी चिंता का केन्द्र भी है और उनकी रचना-प्रक्रिया का अविभाज्य हिस्सा भी.   

“नागरिक मत”

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